Saturday, 11 December 2010

"IF U WANT TO FLY IN LIFE, STOP FLYING KITES"

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दिल्ली की सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के तौर पर जाने-जाने वाले इंडिया हैबिटेट सैंटर में ओल्ड वर्ल्ड थिएटर फैस्टिवल के तहत कुल छह नाटकों का मंचन किया गया, जिसमें से एक रहा मम्ताज़ भाई पतंग वाले ... नाटक के लेखक और निर्देशक मानव कौल हैं ,जिन्होंने नाटक में एक कसाव बरकरार रखा है, ये कही भी बिखरता नहीं,

ये नाटक दो पात्रों बिक्की और मम्ताज़ भाई के इर्द-गिर्द घूमता है...मम्ताज़ एक पतंग बेचने वाला है.... बिक्की की नज़र में पतंग और मम्ताज़ भाई एक दूसरे के पूरक है, मम्ताज़ भाई से बेहतर पतंगबाज़ इस दुनिया में और कोई नहीं..और वो भी उन्हीं की तरह एक पतंगबाज़ बनना चाहता है...पर बिक्की की मां को उसका यूं पतगंबाजी करना पसंद नहीं..और इस तरह उसकी इस इच्छा को दबा दिया जाता है..

नाटक के एक मोड़ पर बिक्की का हीरो मम्ताज़ उसके लिए विलेन बन जाता है, दिल्ली से पहले इस नाटक का मंचन मुम्बई समेत कई अन्य शहरों में भी हो चुका है..नाटक की खासियत मंच का सही और संतुलित इस्तेमाल, और पात्रों का स्पष्ट उच्चारण भी है( जिसका अभाव कई बार एक अच्छे नाटक पर भी पानी फेर देता है ),

मानव ने इस नाटक में काफी़ तजुर्बे करने की कोशिश की है, जैसे अंतरद्वंद्ध के लिए एक चरित्र में दो कलाकारों का इस्तेमाल और पर्दे के पीछे बनने वाली कलाकृतियां जिसे दर्शकों ने काफी पसंद भी किया ,पात्रों के भावों और मंच पर होने वाली तमाम हलचलों को ध्वनि और प्रकाश के ज़रिये बड़ी खूबसूरती से दिखाया गया है, जिसका श्रेय परदे के पीछे के लोगों को भी जाता है...नाटक को देखकर “द काइट राइडर” के कुछ एक दृश्य भी जहन में आजाते हैं


कुल मिलाकर नाटक दर्शकों को बांधे रखता है,मम्ताज़ भाई की भूमिका में आसिफ़ बसरा का अभिनय प्रभावित करता है, उमेश जगतप अंग्रेज़ी के अध्यापक अवस्थी की भूमिका में है जिन्हें बिक्की का यूं पतंगबाज़ी करना कतई पसंद नहीं है अपने संवादों और अभिनय से दर्शकों को गुदगुदाने में सफल रहे,

सौरभ नैयर और घनश्याम लालसा समेत सभी का अभिनय काबिल-ए- तारीफ रहा,
हाल ही में देश के जानेमाने लोगों ने प्रधानमंत्री से शास्त्रीय कला और धरोहर को बचाए जाने की अपील की है, ऑडिटोरियम की शुरुआती सीटों का यूं ख़ाली रह जाना भी उसी अपील को बल देता है

नाटक अगर देख नहीं पाए पर पढ़ ज़रुर सकते हैं यहां क्लिक करें

Saturday, 11 September 2010

"मुझे मालूम है कि सिर्फ़ कुमार जैसा गाने से कुमार गंधर्व नहीं बन सकूंगा "

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मुश्किल ये है कि आज का दौर देखने का है,सुनने का नहीं-पुष्कर.





बस कोई तीन चार बरस का था और बुआ ने एक टॉय हारमोनियम लाकर दे दिया. कुछ बाल कविताएं और राष्ट्रगान उस बाजे के साथ बजाता रहा-गाता रहा . बाद में सात बरस की उम्र में पुणे में दत्त जयंती पर एक प्रस्तुति हुई जिसके बाद मेरी माँ को लगा कि मुझमें एक कलाकार मौजूद है जिसे सही गुरू की ज़रूरत है.

माँ का यह पूर्वानुमान ही मेरी क़ामयाबी की पहली सीढ़ी है क्योंकि यदि उसने मुझमें छुपे गायक को नहीं पहचाना होता तो पुष्कर लेले आपसे आज बात नहीं कर रहा होता.
बहरहाल हम पुष्कर लेले पर आ जाते हैं. पुष्कर लेले संगीताकाश पर तेज़ी से उभरता एक ऐसा नाम है जिससे आप बात करें तो लग जाता है कि आप आने वाले बीस-पच्चीस बरस बाद के उस सितारे से बात कर रहे हैं जो क्लासिकल मौसीक़ी का स्वर-सारथी होगा.

बेहद सादा और स्टारडम से परहेज़ रखने वाले पुष्कर को पहले गुरू के रूप में पं. गंगाधर बुआ पिंपलपुरे मिले जिन्होंने इस कलाकार को शास्त्र से समृध्द किया. बाद में पं.कुमार गंधर्व के ही सुशिष्य पं.विजय सरदेशमुख और पं.सत्यशील देशपांडे ने पुष्कर की गायकी को मांजा.

मेरा सवाल था;कुमार गंधर्व की गायन शैली में ऐसा क्या था जो आपको लगा कि मुझे ऐसा ही गाना है. पुष्कर लेले बोले कि उस गायकी में शास्त्र के अलावा कुमारजी की मौलिकता भी शुमार थी. कुमारजी का गायन अनुसरण करना कठिन है ही उसे सुनना और समझना और ज़्यादा भी मुश्किल. लेकिन मुझे मेरे गले की आवाज़ से ज़्यादा मुझे मेरे मन की आवाज़ सुनाई दी जो बार बार कुमारमय हो रही थी.

क्या आपको सुनते वक़्त लोग कुमारजी से आपकी तुलना नहीं करते होंगे.पुष्कर का जवाब था कि हाँ करते होंगे लेकिन मुझे मालूम है कि सिर्फ़ कुमार जैसा गाने से कुमार गंधर्व नहीं बन सकूंगा...मुझे कुमार-गायन के तमाम अहसास को अपने भीतर तलाशना है. गाते-गाते यह तलाश प्रतिदिन और प्रत्येक कंसर्ट में होती है;और आगे भी जारी रहेगी.और जैसे जैसे कुमार शैली को लोग सराहते हैं तो निश्चित रूप से कुमार जी का ही सुयश है लेकिन मुझे बार बार ये दाद यह याद भी दिलाती है कि मुझे अंतत: श्रोताओं के बीच पुष्कर लेले को स्थापित करना होगा.

यूँ देखा जाए तो शास्त्रीय संगीत गाना एक तरह से सुरों की आस को अपने भीतर तलाशना ही तो है फ़िर वो चाहे कुमारजी के ज़रिये हो या किसी और के.


क्लासिकल म्युज़िक के रियलिटी शोज़ हो सकते हैं क्या?

पुष्कर ने कहा हाँ हो सकते हैं लेकिन उसे अच्छी टीआरपी मिले इसमें शक है. मुश्किल ये है कि आज का दौर देखने का है,सुनने का नहीं.यह पूछने पर कि क़ामयाबी के लिये आज का कलाकार बेसब्र और बेचैन क्यों है ;पुष्कर ने कहा कि आज का क्यों, गुज़रे दौर का या हमारे वरिष्ठ कलाकार भी हैं.जो लोग एक प्रोफ़ेशनल सिंगर की तरह शास्त्रीय संगीत को करियर बनाते हैं उन्हें अपने अस्तित्व के लिये मशक्क़त तो करनी ही है.


गोरे-चिट्टे और गहरी भूरी आँखों वाले पुष्कर लेले बतियाते हुए बहुत जीवंत थे और लग रहा था कि इन गुज़रे दस-बारह बरसों में ये कलाकार बहुत तेज़ी अपनी मंज़िल की ओर अग्रसर है. इन्दौर में हुई मुलाक़ात के दौरान इस कुमार-गायक का आत्मविश्वास कह रहा है कि उसकी तैयारी शानदार है और वह आने वाले समय में अपने कंठ की कारीगिरी से सुनकारों को निश्चित ही चौंकाएगा.


संजय सर के ब्लॉग से साभार

(चित्र क्षितिज माथुर और गूगल से )

Thursday, 19 August 2010

गांव छोड़ब नहीं

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कल पीपली लाइव के एक लोक धुन पर आधारित गीत की बात हुई थी.. आज एक पुराना पर शायद आज के वक्त और परिस्थितों के लिए उपयुक्त गीत... काशीपुर में बॉकसाइट  खदानों के खनन की ख़िलाफ़त करने वाले आदिवासी नेता भगवान माझी के गीत से प्रभावित होकर ये गीत रचा गया है ...जिसका सार जल, जंगल और ज़मीन को बचाए रखने से जुड़ा है...



गीत बताता है कि कैसे कुछ मुनाफ़ाख़ोर लोग, जंगल में रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं ...


( नोट इस गीत को सिर्फ़ नक्सलवाद या माओवाद से न जोड़ें)

video
और अब सुनिये पूरा गीत


video

Wednesday, 18 August 2010

चोला माटी के राम

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कई बार कुछ हटकर और बहती हुई बयार से भी हट कर आ मिलता है... और उसे सहेजना ही सही रहता है... मेरी भी इस छोटी सी पोस्ट के जरिये यही कोशिश है...कई लोगों को पहले पहल पीपली लाइव के इस गीत को सुनकर अटपटा लगा.. लगना लाजमी भी है...

खैर ..गीत ख़ुद में कुछ ऐसा लिए हुए है जो आपको एक बार खींचता ज़रुर है और फिर सुनने को मजबूर करता है...गीत लोक धुन पर आधारित है.. जो गीता के सार को लिए है...कि ये शरीर नशवर है...बहरहाल अब बात गीत से जुड़ी हुई ....

video
'चोला माटी के राम ' मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर की बेटी नगीन तनवीर ने गाया है...गीत उनकी आवाज़ में किसी लोकगायक की आवाज़ का ही एहसास कराता है..

गीत की धुन मंडला के गोंड आदिवासियों के संगीत पर आधारित है...जिसके लफ़्ज़ छत्तीसगढ़ी है...
छत्तीसगढ के लोक कवि गंगाराम सखेत ने इस गीत को लिखा है

Tuesday, 20 July 2010

दुनिया के मेले में लाखों मिले, मगर तू ही तू दिल को भाया हुआ

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Wednesday, 16 June 2010

लोक नृत्य की छटा

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हमारे देश में कला की कमी नहीं, जरुरत है तो उसे देखने पसंद करने और सहेजने के साथ उसका प्रसार करने की ,आपतक पहुंच रहा है यक्ष गान


Friday, 23 April 2010

कैफ़ी आज़मी

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"आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है... आज की रात न फ़ुटपाथ पर नींद आएगी...सब उठो..
मैं भी उठूँ.... तुम भी उठो ...तुम भी उठो ...

कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी..."


(कैफ़ी आज़मी)


कैफ़ी आज़मी की कुछ खास नज़मों में से एक ...


Monday, 12 April 2010

अठन्नी में बजाई है बिस्मिल्ला ख़ान ने शहनाई

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तब उस्तादजी ने बड़े ही लाड़ से जबाब दिया- अरे,बेटी भारतरत्न इ लुंगिया को थोड़े ही न मिला है। लुंगिया का क्या है,आज फटी है,कल सिल जाएगा। दुआ करो कि ये सुर न फटी मिले।


एक मंदिर में केवल आठ आने में शहनाई बजाने वाले उस्ताद बिस्मिला ख़ान की शहनाई की तान से ही पूरे देश की सुबह होती थी। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि के लिए उन्होंने विशेष एलपी तैयार कराया था।


पेंगुइन द्वारा प्रकाशित यतीन्द्र मिश्र की उस्ताद बिस्मिल्ला खान पर लिखित किताब ‘'सुर की बारादरी’ के मुताबिक़, इसके लिए 1957 में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ान साब ने एचएमवी के माध्यम से एक विशेष एलपी तैयार कराया था, जिसमें सुबह और शाम के अलग अलग सात रागों को तीन तीन मिनट के लिए बजाया गया है। बीते सालों में चौदह रागों का यह संग्रह अब आकाशवाणी और दूरदर्शन के मंगल ध्वनि का पर्याय बन चुका है।

21 मार्च 1916 में बिहार के डुमराव में जन्मे बिस्मिल्ला खां कहा करते थे कि संगीत के बहुत से राग हैं और उनसे बनने वाली बहुत सारी रागनियां है। बस यूं समझो कि बहुत सारे पुत्र हैं और उनकी भार्याएं हैं। उनसे पैदा होने वाले बच्चे नवासे और नवासियां हैं।

गंगा जमुनी तहजीब की प्रतिमूर्ति ख़ान साहब ने एक संस्मरण में बताया, ‘‘पंचगंगा घाट पर बाला जी का मंदिर है, जहां हम और हमारे बड़े भाई शम्सुद्दीन घंटों रियाज़ करते थे..वहां पर हमने आठ आने में शहनाई बजाई है।’’ किताब में बकौ़ल ख़ान साहब, ‘‘हम बजा रहे थे, तब तक मंदिर से पंडित जी निकलकर आये और बोले - ‘हियां आ लड़के। तू रोज हियां बजाता है, मंदिर के सामने आरती के समय बजा दिया कर।’...हमने कहा एक रूपया लेंगे...फिर सौदा अठन्नी में पटा।’’

इस्लाम में संगीत की कथित मनाही के बारे में उन्होंने किताब में कहा, ‘‘संगीत वह चीज़ है, जिसमें जात पात कुछ नहीं है..संगीत किसी मज़हब का बुरा नहीं चाहता।..मुझे लगता है कि इस्लाम में मौसिक़ी को इसलिए हराम कहा गया कि अगर इस जादू जगाने वाली कला को रोका न गया, तो एक से एक फ़नकार इसकी रागनियों में डूबे रहेंगे और दोपहर, शाम की नमाज़ कज़ा हो जाएगी।’’


किताब में उन्होंने बनारस के बारे में कहा, ‘‘हमने कुछ पैदा नहीं किया है। जो हो गया, वह उसका करम है। हां अपनी शहनाई में जो लेकर हम चले हैं, वह बनारस का अंग है। जल्दबाजी नहीं करते बनारस वाले, बड़े इत्मीनान से बोल लेकर चलते हैं...ज़िदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज़ करते जवान हुए हैं तो कहीं न कहीं बनारस का रस टपकेगा हमारी शहनाई में।’’
बकौल यतीन्द्र मिश्र- 





तब उस्तादजी को 'भारत रत्न'भी मिल चुका था। पूरी तरह स्थापित और दुनिया में उनका नाम था। एक बार एक उनकी शिष्या ने कहा कि- उस्तादजी,अब आपको तो भारतरत्न भी मिल चुका है और दुनियाभर के लोग आते रहते हैं आपसे मिलने के लिए। फिर भी आप फटी तहमद पहना करते हैं,अच्छा नहीं लगता। उस्तादजी ने बड़े ही लाड़ से जबाब दिया- अरे,बेटी भारतरत्न इ लुंगिया को थोड़े ही न मिला है। लुंगिया का क्या है,आज फटी है,कल सिल जाएगा। दुआ करो कि ये सुर न फटी मिले।





पी.टी आई भाषा से साभार ( दीपक सेन )
यतीन्द्र मिश्र


'सुर की बारादरी’




अब चाहें तो सुन भी सकते हैं उस्ताद जी को  यहां और आगे की कड़ियों में

Saturday, 20 March 2010

कजरी

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आपके लिए कजरी न जाने कहाँ से हाथ लग गयी थी । सोचा कि आपके साथ भी बाँट दी जाए




कजरी / विकास जु़त्शी  |

श्री अजोय चक्रवर्ती
( A famous and very popular Bangla ghazal by Nazrul. Singer Ajoy Chokroborty. A beautiful song with philosophy at its peak.)





Pt.Ajoy Chakraborty


श्री अजोय चक्रवर्ती



RAAG TILAK KAMOD FROM KHUDA KE LIYE


Wednesday, 17 March 2010

उन्‍होंने दुल्हिन कहा और कहा, ‘मेरे अनंत बेटे-बेटियां हैं’

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17 MARCH 2010
बिंध्‍यवासिनी देवी : स्नेह और संगीत का दान देनेवाली जननी

मीना श्रीवास्तव

बिंध्‍यवासिनी जी मेरे जेहन में उन दिनों से बसी हैं, जब मैं बहुत छोटी उम्र की थी। मैं बचपन से उनको रेडियो पर लोकगीत गाते हुए सुनती रही हूं। उन दिनों आकाशवाणी पटना से लोकगीतों के कई कार्यक्रम प्रसारित होते थे और अक्सर उनमें बिंध्‍यवासिनी जी के गीत सुनने को मिलते। साथ ही घर में अपनी मां को मांगलिक अवसरों पर गाते हुए सुनती और देखती।


हमारे ग्रामीण समाज के जीवन में लोकगीत रचे-बसे रहे हैं। आज हालात भले वैसे नहीं रहे, पर एक समय था कि हमारे गांव-घरों में बिना लोकगीतों के कुछ भी पूरा नहीं होता था। ऐसे वातावरण में रेडियो पर लगातार बिंध्‍यवासिनी जी को सुनते हुए लोकगीतों के प्रति लगाव बढ़ता गया और उनसे मिलने की इच्छा मेरे भीतर पलती रही। पर बिंध्‍यवासिनी जी से मिलने की यह इच्छा मेरे लिए स्वप्न जैसी थी।

संयोगवश मेरा विवाह पटना में हुआ। मेरे पति आकाशवाणी में कार्यरत हैं और वे उन्हें चाची संबोधित करते। उनके मुंह से बिंध्‍यवासिनी जी के बारे में सुनना अच्छा लगता और मुझे पता भी नहीं चला कि कब मैं उन्हें चाची कहने लगी। चाची से मिलने का सपना अभी पूरा नहीं हुआ था। हां, उन्हें मंच पर गाते हुए देखने और सुनने के कुछ अवसर जरूर मिले थे। उन दिनों आकाशवाणी द्वारा होनेवाले संगीत कार्यक्रमों के चलते ऐसे अवसर मिले थे। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद वो अक्सर भीड़ में घिरी होतीं और मैं संकोचवश उनसे मिल नहीं पाती। मुझे उनसे मिलने का अवसर तब मिला, जब मैं अपनी बड़ी बेटी वत्सला की कथक नृत्य की शिक्षा के सिलसिले में बिंध्‍य कला मंदिर गयी। मेरे साथ मेरे पति भी थे।

बिंध्‍य कला मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए मेरे पैर कांप रहे थे। वर्षों की साध आज पूरी हो रही थी। सीढ़ियां खत्म होते ही दाहिनी ओर कोने में एक कुर्सी थी। सामने एक मेज थी। पास में दो कुर्सियां थीं। मेज पर उनका बैग रखा था और वो कुर्सी पर बैठी थीं। मैंने अपने भीतर बसी उनकी मूर्ति से उनका मिलान किया। सब कुछ वैसा ही था, जैसा कि उन्हें दूर से देखकर मैं सोचती रही थी। बड़ी-बड़ी आंखों से छलकता अपार स्नेह। छोटी-सी काया में समाहित समूची सृष्टि। मैंने उनके पैर छूए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरा। मेरा माथा चूमकर दुलार किया। बगल की कुर्सी पर बिठाया। मेरे पति को वो बबुआ बुलातीं। मुझे उन्होंने दुल्हिन कहा। अभी के दौर में जब बहू को नाम से पुकारने का चलन है, उनका दुल्हिन पुकारना मन को भिंगो गया।

मैं बिंध्‍य कला मंदिर जाने लगी। बेटी नृत्य का क्लास करती और मैं उनके पास बैठी उन्हें निहारती, उनकी कभी न खत्म होनेवाली बातें सुनती रहती।

उनका जीवन संघर्षों में बीता था। उन्होंने परिवार की मर्यादा में रहते हुए संघर्ष किया और यश तथा लोकप्रियता हासिल की। वो औरों को भी यही सीख देतीं। वो कहतीं, ‘किसी भी उपलब्धि के लिए परिवार का सहयोग होना चाहिए। अगर सहयोग नहीं मिला तो रस की कमी हो जाएगी। फिर तो कंठ ही सूख जाएगा। …फिर राग कहां से फूटेगा!’ वो बीच-बीच में अपने संगीत के खजाने में से कोई राग, कोई धुन, कोई बोल चुनतीं और मुझे बतातीं। मुझे लगता, जैसे वो अपना खजाना मुझ पर लुटा रही हों।

जब लोकगीत की कक्षा चल रही होती, वह मुझे अपने साथ ले जातीं और कक्षा में बिठा देतीं। वो चाहती थीं मुझे विधिवत संगीत सिखाना, पर मेरी अपनी विवशताएं थीं। उनके पास पारंपरिक गीतों का खजाना था। उनके पास हर मौसम, हर अवसर और हर भाव के गीत थे। वो स्वयं रचती भी थीं। उनके गीतों और गायकी में प्रकृति की हर छटा और जिंदगी की हर सच्चाई मौजूद थी। उनके गाने में जादू था। वो जब गातीं थीं, बोल, सुर, लय और ताल सब उनमें घुल-मिल जाते।

एक शाम अचानक वो मेरे घर पहुंचीं। यह मेरे जीवन की कभी न भूलनेवाली शाम थी। उस दिन बिंध्‍य कला मंदिर में नृत्य की कक्षा समय से कुछ पहले समाप्त हो गयी थी और मैं वत्सला को लाने नहीं जा सकी थी। वो वत्सला को साथ लिये पहुंचीं। मैं अपने घर में उन्हें पाकर धन्य-धन्य हुई। उन्होंने हम सब के साथ दो घंटे बिताया। मेरे आग्रह पर उन्‍होंने कुछ दुर्लभ धुनें और बोल बताये। उनके पास आजादी के संघर्ष के दिनों के ऐसे लोकगीतों का भी बड़ा खजाना था, जिसमें आजादी का इतिहास छिपा हुआ है। सन् उन्नीस सौ साठ के आसपास एचएमव्ही द्वारा रिकार्ड किये गये उनके गीतों में से एक ‘पिया ला दे रेशम की डोरी’ की मैंने याद दिलायी, तो वो खिलखिल हंस उठीं। मैं उनकी हंसी की पवित्रता में नहा गयी थी। उनकी वो निर्मल हंसी आज भी मेरे मन में बसी हुई है। उस शाम उन्होंने कहा था, ‘मैं अनंत बेटे-बेटियों की मां हूं।’ यह सच भी है कि वह अपने नाम के अनुरूप देवी का अवतार थीं। वो स्नेह और संगीत का दान देनेवाली जननी थीं।

(मीना श्रीवास्तव। ग्रामीण और नागर, दोनों संस्कृतियों से गहन रिश्‍ता। बिहार के मोतिहारी जिले के माधोपुर मधुमालत गांव में जन्म और लालन-पालन। आरंभिक शिक्षा भी गांव में। कालेज की शिक्षा जनपदीय कस्बाई नगर मोतिहारी में। कभी-कभार संस्मरण लिखती
हैं। बेहद सजग पाठिका। फिलहाल पटना में रहती हैं। उनसे hrishikesh.sulabh@gmail.com पर संपर्क करें।


मौहल्ला लाइव से साभार

Friday, 26 February 2010

मुकुल शिवपुत्र / mukul shivputra

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मुकुल शिवपुत्र जी से जुड़ा कोई अन्य लेख,लिंक,जानकारी आप बाँटना चाहें तो आपका स्वागत है


(श्री मुकुल शिवपुत्र का चित्र)




मुकुल शिवपुत्र का जन्म सन1956 में हुआ। पिता शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकली यानी पं.कुमार गंधर्व ने उन्हें छोटी उम्र में ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत कर दिया।

इसके बाद मुकुल जी ने केजी गिंदे से ध्रुपद- धमार और एमडी रामनाथन से कर्नाटक संगीत सीखा। खयाल के अलावा वे भक्ति और लोगगीत गाना भी पसंद करते हैं।भारतीय शास्त्रीय संगीत के इक्कीसवीं सदी के गायकों में उन्हें संस्कृत में भी संगीत रचनाएं तैयार करने के लिए जाना जाता है ।






पिछले दिनों देश के सांस्कृतिक जगत में भारी हड़कंप मच गया था ।हर तरफ़ से एक ही पुकार आ रही थी कहाँ है मुकुल ? कहाँ है मुकुल ?

मुकुल यानी मुकुल शिवपुत्र , यानी महान ख्याल गायक और किवदंती हो चुके कुमार गन्धर्व के सुपुत्र

कहने वाले कहते हैं कि सत्तावन वर्षीय देश के गिने -चुने शास्त्रीय साधकों में से एक इस फ़नकार ने अपने फ़न को अनुशासित ढंग से लिया होता तो अपने पिता की उम्र की कुल उम्र से पहले ही, कदाचित उनसे ज्यादा मशहूर हो गया होता ।


आज उसके पास नाम, दौलत , पद्मश्री , पद्मविभूषण तथा महफ़िलों का जमावड़ा होता ।
मुकुल जी ने अपने पिता से ही शास्त्रीय संगीत का ककहरा सीखना शुरू किया था , ख्याल गायकी भी उन्ही से सीखी ।


फिर ध्रुपद और धमार की सीख के .जी .गिंडे से ली। उन्होंने एक साल तक एम.डी रंगनाथन से कर्नाटक संगीत की दीक्षा भी ली । उन्होंने शास्त्रीय आधार पर लोकगीत और भजन तो गाए ही संस्कृत के कई श्लोक की भी प्रस्तुतियां दीं ।

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत कि इस अपने तरह कि अकेली देन के बारे में मशहूर है कि उन्होंने पूरे 20 सालों तक तो सिर्फ मंदिरों में गाया ।

राग जसवंती को दूसरे पैठ वाले गायक आलाप था तानों से प्रभावित बनाते हैं , पर मुकुल जी उसे उसके असली रूप में पेश करते हैं ।

राग भैरवी का नाम लेते ही पंडित भीमसेन जोशी का नाम याद आजाता है ,मगर इस राग की मुकुल जी की प्रस्तुति ऐसी मंत्रमुग्ध करने वाली होती है कि इसकी समाप्ति पर श्रोता समूह तालियाँ बजाना ही भूल जाते हैं ।


इसके बावजूद उनपर पिता की स्टाइल का प्रभाव नहीं है । कई साल पहले TIMES OF INDIA
ने उन्हें ज्युनियर नहीं पंडित लिख दिया जिसने अपनी अथक साधना से बहुत कुछ पाया । पर मुकुल जी का एक पक्ष ये भी बताया जाता है कि आम महफ़िल सज गयी हो ।

सब कुछ ताम झाम जुट गया हो , तब भी आयोजकों की सांस ऊपर नीचे होती रहती है कि कहीं मुकुल जी एन वक़्त पर ग़ायब न हो जाएँ ।

बात तो तब बनती है जब पर्दा उठता है और वे तानपुरा लेकर मंच पर दिखते हैं ,



एक बार तो किसी आयोजन में गाकर लौट रहे थे ,बीच में कहीं कार रुकवाई और रफूचक्कर हो गये,और आयोजक उनको उनका पारिश्रमिक देने के लिए ढूँढ़ते रहे ।


इन सबके बाद भी बड़ी बात ये कि "स्पिक मैके " संस्था,(जो बच्चों को शास्त्रीय संगीत सिखाती है ) इस कार्यक्रम में ये यायावर बिल्कुल पहुँच जाते है। फिर वो देश में कहीं भी हो रहा हो ।

कहा जाता है कि इस संगीतज्ञ के उखड़ने का एक कारण उनकी पत्नी की जलने से हुई मौत भी रहा,
मुकुल जी और इनकी पत्नी कैसे आदर्श संगीतज्ञ रहे होंगे ये इसी से स्पष्ट है कि बचपन में एक आद साल का उनका बेटा उनके रियाज़ के वक़्त सही सुर पर ताली बजाता , और ग़लत ग़लत सुर पर चिढ़ने लगता .

"मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा ,न ये दश्त मेरा, न ये चमन मेरा "

नवीन जैन
लेख आहा ज़िन्दगी से साभार ,






गूगल पर मुकुल शिवपुत्र टाइप कर, उनके बारे में कुछ जानकारी खोजने लगा तो 8 ,550 result दिखे। असल में मुझे उनकी जन्म तिथि देखनी थी,
यहाँ तक कि विकिपीडियामें उनकी मामुली जानकारी दे सकने वाला एक आद पेज भी नहीं बना आज तक,

न जाने कितनी कंपनियाँ उनके नाम और काम से मोटी कमाई करती होंगी,पर ये कलाकार आज वो ख़ुदगुमनामी की ज़िन्दगी जी रहा है



मुकुल शिवपुत्र जी से जुड़ा कोई अन्य लेख,लिंक,जानकारी आप बाँटना चाहें तो आपका स्वागत है


सागर नाहर जी ने पिछले दिनों एक पोस्ट के साथ वीडियो जोड़कर, एक बार फिर मुकुल जी की याद ताज़ा कर दी.

(वी़डियो में मुख्य किरदार को अगर हम मुकुल जी की जगह रखें )

Tuesday, 26 January 2010

गणतंत्र

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गणतंत्र के दिवस के इस अवसर पर अपने शहीद सैनिकों को श्रदांजलि



जो समर मे हो गए अमर मै उनकी याद में
गा रही हूँ आज श्रद्धागीत धन्यवाद में


लौट कर न आएँगे विजय दिलाने वाले वीर
मेरे गीत अंजली मेंउनके लिए नयन नीर
संग फूल-पान के,रंग हैं निशान के
शूर वीर आन के...

विजय के फूल खिल रहे हैं
फूल अधखिले झरे
उनके खून से हमारे खेत-बाग बन हरे
ध्रुव हैं क्रांति गान के
सूर्य नव विहान के
शूर वीर आन के...

वो गए कि रह सके स्वतंत्रता स्वदेश की
विश्व भर में मान्यता हो मुक्ति के संदेश की
प्राण देश-प्राण के
मूर्ती स्वाभिमान के
शूर वीर आन के....

(लता मंगेशकर, पं नरेन्द्र शर्मा, जयदेव)


Wednesday, 20 January 2010

मालवा की मिट्टी से जुड़ा शास्त्रीय गायक

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कुमार जी से संबंधित लेख,लिंक को इस पोस्ट में शामिल करने की मेने पूरी कोशिश की है, और आपसे भी अनुरोध है कि इसे और बेहतर बनाने में मेरी सहायता करें,उन से संबधिंत जानकारी को बाँट कर


शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकाली यानी हमारे कुमार जी और बाक़ी सब के कुमार गंधर्व

वे जब इंदौर के छोटी लाइन के रेलवे स्टेशन पर उतरे तो चौबीस बरस के थे ।

कर्नाटक के धारवाड़ में 8 अप्रेल 1924 को जन्में और पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर से संगीत की शिक्षा पाने वाले शिवपुत्र जन्मजात गायक थे।




दस बरस की उम्र से ही संगीत समारोहों में गाने लगे थे और ऐसा चमत्कारी गायन करते थे कि उनका नाम
कुमार गंधर्व पड़ गया ।
लेकिन इंदौर वे गाना गाने नहीं मालवा की समीशीतोष्ण जलवायु में स्वास्थ लाभ करने आए थे । उन्हें टी .बी थी जिसका उन दिनों कोई पक्का इलाज़ नहीं था । देवास में रह कर उन्हें स्वस्थ होना था ।
लेकिन जिस दिन वे इंदौर उतरे वह हाल ही आज़ाद हुए भारत का सबसे काला दिन था ।

30 जनवरी 1948 में ,दिल्ली में नाथुराम गो़डसे ने महात्मा गाँधी की हत्या कर दी थी । मालवा में स्वास्थ्य लाभ के जीवन की शुरुआत शुभ मुहुर्त में नहीं हुई थी ।

कुमार जी की पत्नी भानुमती ख़ुद एक गायिका थीं । लेकिन देवास में स्कूल में पढ़ा कर गायक पति का इलाज और घर चलाती थीं ।

जितनी सुन्दर थीं उतनी ही कुशल गृहणी नर्स थीं । कुमार जी स्वस्थ होकर फिर से वह नई तरह का गायन कर सके इसका श्रेय भानुताई को ही दिया जाना चाहिए ।
जिस घर में कुमार जी स्वास्थ लाभ कर रहे थे ,तब वेह देवास के लगभग बाहर था, और वहां हाट लगा करता था ।

कुमार जी ने वहीं बिस्तर पर पड़े पड़े मालवी के खांटी स्वर महिलाओं से सुने । वहीं पग- पग पर गीतों से चलने वाले मालवी लोक जीवन से उनका साक्षातकार हुआ ।
संगीत वे सीखे हुए थे और शास्त्रीय गायक में उनका नाम भी था ।लेकिन स्वस्थ होते हुए और नया जीवन पाते हुए उनमें एक गायक का भी जन्म हुआ ।
सन 1952 के बाद जब वे चंगे होकर गाने लगे तो पुराने कुमार गन्धर्व नहीं रह गये थे ।



एक दिन मामा मजूमदार के घर छोटी सी महफ़िल में गाते हुए उन्होंने अचानक कहा " अब मुझे गाना आ गया"।
वह हमारे मालवा के अन्यतम गायक कुमार गंधर्व का जन्म था । उन्हें बचपन से सुनने वाले वामन हरी देशपांडे ने उन दिनों के बारे में लिखा है .

"न जाने देवास की ज़मीन में कैसा जादू है। मुझे वहां की मिटटी में संगीत की सुगंध प्रतीत हुई ।"

मालवा के लोक जीवन से कुमार जी के साक्षात्कार पर देशपांडे ने लिखा ,
"बिस्तर पर पड़े-पड़े वे ध्यान से आसपास से उठने वाले ग्रामवासियों के लोकगीतों के स्वरों को सुना करते थे ।
वे उन लोकगीतों और लोक धुनों की और आकर्षित होते चले गये ।
इसे में से एक नये विश्व का दर्शन उन्हें प्राप्त हुआ ।"


मालवा के देवास में फिर जन्मे कुमार गंधर्व को सारी दुनिया जानती है । उनका गायन अपने ढंग का अनूठा है ।

सन 1961 में दुसरे पुत्र को जन्म देते हुए भानुताई का निधन हो गया ।

कुमार जी ने अपने नये घर का नाम भानुकुल रखा । फिर वशुंधरा ताई से विवाह किया ।



भानुताई से हुआ मुकुल, और वसु ताई से हुईं कलापिनी ,दोनों ही गाते हैं ।

कुमार जी को यश , कीर्ति और धन सब मिला ।


अड़सठ बरस की उम्र में 12 जनवरी 1992 में देवास में उनका निधन हो गया । लोक संगीत को शास्त्रीय से भी ऊपर ले जाने वाले कुमार जी ने कबीर को जैसा गया वैसा कोई नहीं गा सकेगा ।

कालिदास के बाद कुमार गन्धर्व मालवा के सबसे दिव्य सांस्कृतिक विभूति हैं




ये लेख प्रभाष जोशी द्वारा (वाह ! मध्यप्रदेश में ) लिखा गया है

कुमार जी से संबंधित लेख,लिंक को इस पोस्ट में शामिल करने की मेने पूरी कोशिश की है, और आपसे भी अनुरोध है कि इसे और बेहतर बनाने में मेरी सहायता करें,उन से संबधिंत जानकारी को बाँट कर
कुमार जी यहाँ भी मौजूद हैं

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निर्भय निर्गुण गुण रे गाऊंगा
मूल-कमल दृढ़-आसन बांधूं जी
उल्‍टी पवन चढ़ाऊंगा ।।
निर्भय निर्गुण ।।
मन-ममता को थिर कर लाऊं जी
पांचों तट मिलाऊंगा जी
निर्भय निर्गुण ।।
इंगला-पिंगला-सुखमन नाड़ी
त्रिवेणी पे हां नहाऊंगा
निर्भय-निर्गुण ।।
kumar gandharva

पांच-पचीसों पकड़ मंगाऊं-जी
एक ही डोर लगाऊंगा
निर्भय निर्गुण ।।
शून्‍य-शिखर पर अनहद बाजे जी
राग छत्‍तीस सुनाऊंगा
निर्भय निर्गुण ।।
कहत कबीरा सुनो भई साधो जी
जीत निशान घुराऊंगा ।
निर्भय-निर्गुण ।।


  • कुछ तस्वीरें
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Dewas and Pt. Kumar Gandharva are inseparable. The thought of one, brings the other automatically to one’s mind. There is hardly anyone who has not passed by ‘Bhanukul’ ( Kumarji’s residence ) on the way to Mataji’s Tekri. I have had the good fortune to visit Bhanukul on a couple of occasions marking Kumarji’s ‘punya-tithi’ ( death anniversary). ‘Bhanukul’ retains the old –age charm of spacious houses which used to be surrounded by trees, plants and flowers.

 Its interior has Kumarji’s signature in each and every room- the ‘Padma Bhushan’ and ‘Padma Vibhushan’ awards occupying a place of pride in the main hall, a black and white photograph of Kumarji as a young boy, decked up in royal medals and badges and several other photographs which send us down memory lane. All these are a fitting tribute to one of India’s finest Hindustani Classical singers, Shivputra Sidhharamyya Komkali, popularly known as Pt.Kumar Gandharva.

I first heard Kumarji’s amous Kabir-bhajan ‘Ud Jayega Hans Akela’ while listening to one of his CDs. Being a student of Hindustani Classical music, it took me no time to realize that he and only he, would soon become my favorite singer. Today, after three to four years of my training in Hindustani Classical music, I am confident that there’s no one else like Kumarji.
Pt. Kumar Gandharva was born on 8th April,1924 in Sulebhavi near Belgaum ( Karnataka) to a Kannadiga family. He studied music under Prof B R Deodhar and Ms. Anjanibai Mhalpekar, two eminent musicians of his time.

He married Bhanumati Kans in April 1947 and moved to Dewas, Madhya Pradesh. Soon after moving there, he was stricken with lung cancer. He was forced into having a surgery to remove the cancerous lung or face eventual death by the disease. Kumarji opted for the surgery after much persuasion by his family and despite warnings that he might not be able to sing anymore. Recovering from the trauma of a surgery in Khanapur near Belgaum in Karnataka,

Kumar Gandharva was visited by a fan who was also a physician. The doctor noted his surgical wounds had healed and asked Pt.Kumar Gandharva to attempt singing once again. Gradually, helped by this doctor, medicines of those yesteryears and care from Bhanumati Kans,

 Kumar Gandharva recovered and began singing again. However, his wonderful voice and singing style would always bear the scars of his surgery, which are evident to any person who listens to his songs such as 'Runanubandhachya" from the drama "Dev Dina Ghari Dhavla". Ironically, it ('Runanubandhachya") is one of his finest renditions. He was known to say that during his convalescence after the illness, he had been inspired by a sparrow which visited his room and which, despite its diminutive size, could produce an impressive volume of music.

His first ‘mehfil’(public peroformance) after recovery from illness was in 1953. The illness greatly affected Kumarji's singing in later years – he was to be known for powerful short phrases and his very high pitched voice. He may not have reached the same heights of popularity as contemporaries like Bhimsen Joshi, but he always enjoyed the love and support of a select band of people who were devoted to his unorthodox yet unique style of singing.

Kumarji also experimented with other forms of singing such as Nirguni bhajans (Devotional songs), folk songs, and with both ragas and presentation, often going from fast to slow compositions in the same raga, something rarely done by any other North Indian musician. He is remembered for his great legacy of innovation, questioning tradition without rejecting it wholesale, resulting in music in touch with the roots of Indian culture, especially the folk music of Madhya Pradesh.

The fascination with words and meanings, and personal experience, was undoubtedly related to Kumarji's strong beliefs about folk music. He believed (and who can dispute it?) that all "classical" music is an outgrowth of folk music, where the most basic elements of life and nature are expressed in musical form. In his view, classical raagas are nothing but the distillation of musical essence from a class of folk songs, and this led him to an enterprise to discover "new" raagas by simply listening carefully to more and more folk songs.

 He called these "Dhun Ugam Raagas", and many of his discoveries -- Madhsurja, Ahimohini, Saheli Todi, Beehad Bairav, Lagan Gandhar, Sanjaari, Maalvati -- are now accepted as raagas and find mention in various modern texts such as "Raga Nidhi".

For a long spell, Kumar Gandharva's activities as a musician were managed by his friend and tabla accompanist Vasant Acharekar. Acharekar was Vasant Desai's assistant in the 1950s but later devoted himself fully to his role as an accompanist to classical singing. His son Suresh Acharekar is also a tabla player, and has accompanied Kumar Gandharva and other artists.

Pt. Kumar Gandharva's first son, Mukul Shivaputra, was born around 1955. After Bhanumati's death in 1961 during childbirth, Kumarji married Vasundhara Shrikhande, another of his fellow-students at Deodhar School. Vasundhara Komkali formed a memorable duo with him in bhajan singing. She also provided vocal support to his classical renditions quite often. Recently, she has received the prestigious Padmashree Award for her contribution to vocal classical music.Their daughter Kalapini Komkali and Kumarji’s grandson Bhuavanesh Komkali, are well known names in the field of Hindustani Classical Music.

Kumar Gandharva was awarded the Padma Vibhushan award in 1990. He also received the prestigious Sangeet Natak Academy award and the Shikhar Samman and Kalidas Samman conferred by the M.P. government.
‘Gandharva’ literally means celestial singers who sing to entertain the Gods. And true to form, Kumarji was a celestial singer deputed by the heavens to complete a short stint on earth. It is only appropriate that the Indian government gives out the Kumar Gandharva Samman every year to an outstanding and upcoming artiste at a function held at the Malhar Smriti Mandir, Dewas. The likes of Pt. Mukul Shivputra, Pt. Rajan Sajan Mishra, Gundecha Brothers and Ustad Rashid Khan ( to name just a few ) have been the recipients of this coveted award.

Words cannot sum up the greatness of this great artiste. Pt. Kumar Gandharva will be remembered as perhaps the only artiste who followed rules, played with them, broke them and modified them only to enhance the status of Indian Classical music. We shall remain indebted to this great singer forever.

















zSHARE - KumarGandharv_RaghubarKiSudh.mp3



 लेख मेरे मित्र Upkar Godboley ने लिखा है