Monday, 5 December 2011

मेहदी हसन से बातचीत

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अपने बारे में ,और अपनी ज़िंदगी के बीते हुए पलों से रू-ब-रू कराते मेहदी साहब
















(पहला भाग )

(दूसरा भाग



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बीता साल (2011) काफ़ी भारी सा रहा कला जगत पर ,एक से बढ़कर एक कलाकार दुनिया को अलविदा कह गए , बहुत से लोगों को लगा साल जल्द से जल्द खतम हो और ऐसे बुरी ख़बरों से निजात मिले ,पर साल की शुरुआत में ही (13 जनवरी 2012) खबर आई कि मेहदी हसन साहब की तबियत खराब है ,और उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है , इसी बीच लोगों में ख़ास तौर से Internet पर अफवाओं का एक दौर सा चल पड़ा ,लोगों ने ही नही बल्कि online अख़बारों ने भी चूक कर दी ,किसी ज़िंदा शख्स को जीते जी मार दिया !



और जाते जाते मेहदी हसन साहब की पुरकश आवाज़ में -
'पनिया भरे रे कौन अलबेले की नार '




(audio courtesy -arun ji)

आजा चल दें कहीं दूर .....

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वहीदा रहमान अपनी कुछ यादों के साथ .....

वर्ष 2011 देश के कलाकारों, और बाक़ी क्षेत्रों से संबंध रखने वाले कुछ नामी चेहरों को हमसे छीन गया !
ये सिलसिला जैसे मानो पूरे साल भर चलता रहा और दिसम्बर आते -आते देवआनंद भी हमसे दूर चले गए   ! शुरूआत हुई जनवरी से जब शास्त्रीय संगीत के स्तंभ कहे जाने वाले भीमसेन जोशी  (किराना घराना ) इस दुनिया को अलविदा कह गए !



पर देखा जाए तो ये साल कला -साहित्य जगत पर काफी भारी सा रहा ! शम्मी कपूर, जगजीत सिंह, उस्ताद सुलतान खान, श्रीलाल शुक्ल ,
भूपेन हज़ारिका, हरगोविंद खुराना ,

मंसूर अली खान पटौदी, मशहूर फोटोग्राफर गौतम राजाध्यक्ष ,
मक़बूल फ़िदा हुसैन ,अन्नत पाई (popularly known as Uncle Pai ) ,और कम ही लोगों को याद रहने वाले संगीतकार दान सिंह 

               
(This year has seen departure of several people
 who were pioneer of sorts for their chosen vocations in this country, or werealmost synonymous with that art-form itself. Gautam Rajadhyaksha to glamour photography, Bhimsen Joshi to Khayal, Hussain to fine-arts and Partap Sharma to voice-over. The golden voice behind many newsreels, documentaries and ad-films from 60's, 70's and 
and 80's, Partap Sharma was also a theatre veteran and playwright) (film : phir bhi)

देव साहब को 'पीटर पैन ' कहा जाता , जो सपने देखने और उन्हें हकीक़त बदलने की कोशिश में रहता

                               video

                                 
देव आनंद का असल नाम धर्म देव रहा (देव दत्त नहीं ) ,देव साहब ने 'धर्म को अपने नाम के आगे से हटा दिया, वो कहते हैं ''i took off 'Dharam'  because dharam is a big problem in the world' so i just kept dev, sweet nice , Anand is my surname.''

पांच बहने और दो भाइयों के बीच उन्होंने दो भाइयों, दो बहनों को खोया ! पिता गुरदासपुर में वकील थे,देवसाहब को  गुल्ली डंडा ,क्रिकेट, जैसे खेलों का बचपन से शोक था ! आगे की  पढाई के लहोरे के गवर्मेंट कॉलेज में जाना चाहते थे पर पिता की माली हालत ठीक ना थी , इसी दौरान देव साहब की माँ की तबियत काफी खराब हुई , देव साहब उस दौरान अपनी माँ के काफी करीब आ गए , देव साहब की  माँ ने उनके पिता से मरते हुए ये इच्छा ज़ाहिर की , कि वो देव को आगे पढ़ने दें !

जब Masters ( M.A. LITERATURE) के लिए आगे पढ़ना चाह रहे थे  तो पिता ने अपनी मज़बूरी ज़ाहिर करते हुए उन्हें बैंक में नौकरी करनी की सलाह दी !

इसी के बाद उन्होंने बम्बई का रुख कर लिया ,सामने बॉम्बे सेंट्रल की कई  ऊँची ऊँची इमारते थीं, और जेब में सिर्फ ३०  रूपये थे !

१९४५ (1945) का वो दौर आया जब  उन्होंने अपनी ज़रूरतों के लिए कुछ समय के लिए मिलट्री सेंसस ज्वाइन  कर लिया ! जहाँ उन्हें सैनिकों के खत पढ़ने पढ़ते !

इसी दौरान प्रभात फिल्म्स में मिली पहली फिल्म के लिए काफी जदोजेहद भी करनी पड़ी ,बाबुराव पाई   (Baburao Pai ) से  तेज बरसात होने के बाद भी मिलने गए ,और मुलाक़ात के बाद ही माने ! बाबु राव पाई ने ही उनकी मुलाक़ात पी एल संतोषी से करवाई !


बाक़ी की बातें इस विडियो में :




video

Saturday, 19 February 2011

भला हुआ मोरी गगरी फूटी, मोरे सर से टली बला

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Munshi Raziuddin archives : Bhala Hua Mori Gagri Phooti


Like other Sufis, Kabir helped unite all.

Munshi Raziuddin has helped preserve this treasure of knowledge and poetry.

The late Munshi Raziuddin, a Sufi at heart, Ustad of Qawwali and Khayal sang for over sixty-five years. He successfully passed on the tradition to his sons “Farid Ayaz & Abu Muhammad Qawwal brothers”. The group in this rendition consists of himself, his four sons, grandsons and others.

Munshi Raziuddin’s family has sung Qawwali for eight centuries. He belonged to the Delhi Gharana of "Ustad Tan Ras Khan Sahab" who was a teacher of the last Mughal Emperor Bahadur Shah Zafar. Descendants of Mian Samad Bin Ibrahim who was the first pupil of Hazrat Ameer Khusroo and the Group Leader of the team, formed by Hazrat Ameer Khusroo called "Qawwal Bachoon Ka Gharana".

The Government of Pakistan honoured Munshi Raziuddin with the Pride of Performance in 1990 for his devotion to the field of Qawwali and research in music.